बिना अधिकारियों के कैसे मुख्यमंत्री की परिकल्पना के मॉडल जिले में लगेंगे पंख, एसडीएम से डीएफओ तक कई जिम्मेवार अधिकारियों की कुर्सियां है खाली

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चंपावत। राज्य सरकार भले ही चंपावत को मॉडल जिला बनाने के लिए तमाम साधन व संसाधन जुटाती जा रही है, लेकिन मुख्यमंत्री की परिकल्पना के अनुसार मॉडल जिले में काम करने वाले अधिकारियों के हाथ कम पड़ते जा रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि प्रशासनिक ढांचे की रीढ़ माने जाने वाले कई प्रमुख पद रिक्त पड़े हैं, जिससे न केवल आम जनता के कामकाज प्रभावित हो रहे हैं बल्कि अन्य अधिकारियों पर दोहरा भार भी पड़ता जा रहा है। यह बात अलग है कि जिलाधिकारी के जनता दरबारो ने इस कमी को महसूस नहीं होने दिया है।

लेकिन जिन रिक्त पदों का भार अन्य अधिकारियों को दिया गया है उन्हें कमर सीधी करने की फुर्सत नहीं मिल रही है।

किसी भी तहसील के समुचित संचालन और विकास में उपजिलाधिकारी (एसडीएम) की भूमिका बेहद अहम होती है, लेकिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के गृह जनपद की चार तहसीलों में से लोहाघाट और टनकपुर में एसडीएम के पद खाली चल रहे हैं। इसमे लोहाघाट तहसील का पद तो काफी समय से तथा मैदानी क्षेत्र की पूर्णागिरी तहसील में एसडीएम का पद इसी हफ्ते रिक्त हुआ है। इससे राजस्व, आपदा, कानून व्यवस्था और विकास से जुड़े कई कार्य प्रभावित होना स्वाभाविक है। जिलाधिकारी अपनी “क्विक एक्शन” की कार्य संस्कृति के कारण आम लोगों को तत्काल लाभ पहुंचाना चाहते है। भले ही कार्य निपट रहे है लेकिन इससे कार्य के भार से दबे अधिकारियों का दर्द भी समझना होगा। इतना ही नहीं, जिले में बीते चार माह से डीएफओ जैसे महत्वपूर्ण पद की तैनाती भी नहीं हो सकी है। इसका सीधा असर वन विभाग से जुड़ी योजनाओं और विभिन्न कार्यदायी संस्थाओं के विकास कार्यों पर पड़ रहा है। इसके अलावा खेल विभाग, पीआरडी, होमगार्ड्स और उद्योग विभाग जैसे अहम विभाग भी बिना मुखिया के ही संचालित हो रहे हैं।

अधिकारियों की इस कमी का खामियाजा सीधे तौर पर आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। लोगों के छोटे-बड़े कार्य लंबित पड़े हैं और मॉडल जिला की परिकल्पना अधिकारियों की कमी के चलते सवालों के घेरे में खड़ी नजर आ रही है। वहीं अधिकारियों की कमी को लेकर प्रशासन का कहना है कि कार्य प्रभावित न हों, इसके लिए वैकल्पिक व्यवस्थाएं की गई हैं और खाली पदों पर शीघ्र तैनाती के लिए शासन एवं संबंधित निदेशालयों को पत्र भेजे जा चुके हैं। अब बड़ा सवाल यह है कि मुख्यमंत्री अपने गृह जनपद में अधिकारियों की इस भारी कमी को कब तक दूर कर पाएंगे?

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