

दो साल से फाइलों में अटकी सीएम घोषणा, 40 हजार लोग प्रभावित ग्रामीणों में आक्रोश, चुनाव बहिष्कार की चेतावनी।
लोहाघाट। उत्तराखंड के “मॉडल जिले” चंपावत की जमीनी सच्चाई विकास के दावों पर सवाल खड़े कर रही है। एक ओर चंपावत विधानसभा है, जहां से खुद मुख्यमंत्री समेत तीन दर्जा राज्यमंत्री हैं, वहीं दूसरी ओर लोहाघाट विधानसभा के हजारों ग्रामीण आज भी महज 4 किलोमीटर सड़क के लिए दशकों से संघर्ष कर रहे हैं। गोलना-शेरी घाटी को जोड़ने वाली बहुचर्चित सड़क को वर्ष 2024 में मुख्यमंत्री की घोषणा में शामिल किया गया था, लेकिन दो साल बीतने के बाद भी यह परियोजना विभागीय फाइलों में ही उलझी हुई है। पाटी विकासखंड के सांगों, घिंघारुकोट, बांस बंसवाड़ी समेत कई गांवों के करीब 40 हजार लोगों की आवाजाही, सब्जी उत्पादन और अंतिम संस्कार तक इसी सड़क पर निर्भर हैं। बावजूद इसके, सड़क निर्माण वन विभाग की आपत्तियों में फंसकर आगे नहीं बढ़ पाया है।
ग्रामीणों का आरोप है कि जिला मुख्यालय तक ही विकास सीमित रह गया है, जबकि दूरस्थ गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। दिसंबर माह में ग्रामीणों ने जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर सड़क निर्माण की मांग उठाई थी, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है। 80 वर्षीय इंद्रा पाण्डेय ने भावुक होकर कहा,
“चार किलोमीटर सड़क के लिए हमारी चार पीढ़ियां गुजर गईं अब कम से कम हमें अंतिम यात्रा के लिए ही सड़क दे दी जाए।”
स्थानीय निवासी नंदू पाण्डेय का कहना है कि सरकारों की उपेक्षा और कागजी विकास के चलते गांव तेजी से खाली हो रहे हैं। यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाली पीढ़ी गांवों को सिर्फ किताबों में ही देखेगी। वहीं सुरेश जोशी ने चेतावनी दी कि सड़क के अभाव में युवाओं का पलायन तेजी से बढ़ रहा है। यदि यही स्थिति रही तो आने वाले समय में गांवों के साथ राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी प्रभावित होगा।
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जनआक्रोश उफान पर चुनाव बहिष्कार तक पहुंचा मामला, सड़कों पर उतरने की तैयारी।
लोहाघाट। विधानसभा के दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में 4 किलोमीटर सड़क निर्माण में लगातार हो रही देरी अब जनआक्रोश का रूप ले चुकी है। सांगों, घिंघारुकोट, बांस बंसवाड़ी समेत दर्जनों गांवों के लोगों का कहना है कि वर्षों से सिर्फ आश्वासन और घोषणाएं ही मिल रही हैं, जबकि जमीनी स्तर पर कोई काम नहीं हो रहा। ग्रामीणों का आरोप है कि वर्ष 2024 में मुख्यमंत्री द्वारा की गई घोषणा के बाद उम्मीद जगी थी कि अब सड़क निर्माण जल्द पूरा होगा, लेकिन दो साल बीतने के बाद भी योजना वन विभाग की आपत्तियों में उलझी हुई है। दिसंबर माह में क्षेत्र के युवाओं, बुजुर्गों और जनप्रतिनिधियों ने जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर सड़क निर्माण की मांग उठाई थी, लेकिन अब तक न तो कार्य शुरू हुआ और न ही कोई स्पष्ट समयसीमा तय की गई।
ग्रामीणों ने साफ कहा है कि यदि जल्द सड़क निर्माण शुरू नहीं हुआ तो वे बड़े आंदोलन के लिए मजबूर होंगे। क्षेत्र के युवाओं का कहना है कि अब केवल ज्ञापन नहीं, बल्कि धरना-प्रदर्शन और सड़क पर उतरकर विरोध किया जाएगा।
लगातार उपेक्षा से आक्रोशित ग्रामीणों ने आगामी विधानसभा चुनाव में मतदान बहिष्कार की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि जब मूलभूत सुविधा तक नहीं मिल पा रही, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी का क्या औचित्य रह जाता है। सड़क न होने के कारण क्षेत्र में उत्पादित सब्जियां समय पर बाजार तक नहीं पहुंच पा रहीं, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। वहीं युवाओं का तेजी से पलायन हो रहा है, जिससे गांव खाली होने की कगार पर पहुंच गए हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन और सरकार से पूछा है कि आखिर मुख्यमंत्री की घोषणा के
बाद भी सड़क निर्माण में देरी क्यों हो रही है और इसका जिम्मेदार कौन है?


