सीएम की अधूरी घोषणा से उबल रहा गुस्सा, आंदोलन को मजबूर ग्रामीण, “अब डोली हमारी नियति नहीं बन सकती” – चन्द्र मोहन पाण्डेय

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फोटो – बीमार बुजुर्ग महिला को इलाज के लिए डोली में ले जाए जाते ग्रामीण।

 

डीएम के ज़रिये सीएम को ज्ञापन, सड़क नहीं बनी तो उग्र आंदोलन तय। 

जनता मिलन में डीएम से मिलेंगे ग्रामीण, एक हफ्ते का अल्टीमेटम

 

लोहाघाट। एक ओर राज्य सरकार पहाड़ों को सड़कों से जोड़कर पलायन रोकने, युवाओं को रोजगार देने और “बेटी पढ़ाओ, बेटी बढ़ाओ” जैसे नारों की बात करती है, वहीं दूसरी ओर पाटी ब्लॉक के सुदूरवर्ती गांव आज भी बुनियादी सड़क सुविधा से वंचित हैं। पटनगांव, गीजू-बसान, बांस-बस्वाड़ी, जमनटाक, डौड, घिंघारूकोट जैसे दर्जनों गांवों के लिए सड़क आज भी एक सपना बनी हुई है। हालात इतने भयावह हैं कि स्कूली छात्राएं रोज़ाना जान जोखिम में डालकर जंगलों से होते हुए करीब 5 किलोमीटर पैदल स्कूल जाने को मजबूर हैं। जंगली जानवरों का डर, दुर्गम रास्ते और आपात स्थिति में इलाज के लिए डोली—यही इन गांवों की सच्चाई है। सड़क न होने से खेती-किसानी, फल-सब्ज़ी उत्पादन और आजीविका पूरी तरह प्रभावित हो रही है। मजबूरी में लोग गांव छोड़कर पलायन कर रहे हैं, लेकिन सरकार और प्रशासन वर्षों से इस घाटी क्षेत्र की अनदेखी करता आ रहा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि सीएम की घोषणा संख्या 147/2024, तथा वर्ष 2021-22 में मिली प्रारंभिक वित्तीय स्वीकृति के बावजूद आज तक ज़मीन पर एक इंच भी सड़क नहीं बनी। फाइलें विभागों और शासन के दफ्तरों में घूम रही हैं, जबकि ग्रामीणों का धैर्य जवाब दे चुका है। सामाजिक कार्यकर्ता चन्द्र मोहन पाण्डेय ने दो टूक कहा “महिला और बुजुर्गों को डोली में ढोना हमारी रोज़मर्रा की नियति बन गई है। शासन-प्रशासन सालों से कागज़ी खानापूर्ति कर ग्रामीणों को ठगता रहा है। अब और बर्दाश्त नहीं होगा।” वहीं, बुजुर्ग ग्रामीण रतन सिंह का कहना है “हमें घोषणाएं नहीं, सड़क चाहिए। वादों और फाइलों के खेल में हमारी ज़िंदगी बीत गई।” प्रशासन की सुस्ती से निराश ग्रामीणों ने 29 दिसंबर को जिलाधिकारी मनीष कुमार से मुलाकात कर मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजने का निर्णय लिया है। चेतावनी साफ है। यदि एक सप्ताह के भीतर सड़क निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ, तो उग्र आंदोलन किया जाएगा।

साथ ही जनप्रतिनिधियों से भी सड़क निर्माण के लिए समर्थन और आंदोलन में सहयोग की अपील की जाएगी।

 

 

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करीब दो साल बीत चुके हैं, न घोषणा ज़मीन पर उतरी, न कागज़ी प्रक्रिया पूरी हुई। केवल घोषणाओं से विकास नहीं होता, विकास तब होता है जब काम दिखे। कागज़ों में विकास के दावे ग्रामीणों के साथ खुला छल हैं। यह तथाकथित आदर्श जिले की सच्चाई को भी उजागर करता है।

 

 

 

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