चंपावत। शिक्षा के क्षेत्र में समर्पण और ईमानदारी की मिसाल बन चुके जनपद चंपावत के शिक्षक प्रकाश चंद्र उपाध्याय ने अपने कर्तव्यबोध से एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने न केवल पूरे एक वर्ष में एक भी आकस्मिक अवकाश (सीएल) नहीं लिया, बल्कि लगातार तीन वर्षों से आकस्मिक अवकाशों का पूर्ण त्याग कर शिक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को सिद्ध किया है।
विशेष बात यह है कि श्री उपाध्याय ने रविवारों एवं दीर्घावकाशों में किए गए अतिरिक्त कार्य के बदले मिलने वाले कई प्रतिकर अवकाश भी स्वेच्छा से नहीं लिए। उनका स्पष्ट मानना है कि विद्यार्थियों की शैक्षणिक प्रगति शिक्षक की निरंतर उपस्थिति, मार्गदर्शन और समर्पण पर निर्भर करती है। इसी सोच के साथ उन्होंने सदैव शिक्षण कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उनके इस त्याग, अनुशासन और कर्मनिष्ठा की चर्चा आज शिक्षा जगत में व्यापक रूप से हो रही है। विद्यालय परिवार, अभिभावकों और स्थानीय समुदाय ने उनके इस असाधारण समर्पण की भूरी-भूरी प्रशंसा की है। समय पालन, सकारात्मक दृष्टिकोण और विद्यार्थियों के प्रति उनकी संवेदनशीलता उन्हें अन्य शिक्षकों के लिए एक प्रेरणास्रोत बनाती है। शिक्षक प्रकाश चंद्र उपाध्याय की सेवाओं को देखते हुए उन्हें राज्य का सर्वोच्च ‘शैलेश मटियानी उत्कृष्ट शिक्षक पुरस्कार’ सहित अनेक सम्मान प्रदान किए जा चुके हैं। लगातार तीन वर्षों तक आकस्मिक अवकाश न लेकर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि एक सच्चे शिक्षक की पहचान उसका समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा होती है। अपने विचार साझा करते हुए श्री उपाध्याय कहते हैं, “जब अपने कार्य से प्रेम हो जाए और उसी में आनंद मिलने लगे, तो अवकाश की आवश्यकता ही नहीं रहती। भारतीय संस्कृति सदैव कर्मप्रधान रही है।”
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि वर्ष 1889 से पहले भारत में सप्ताह के सातों दिन कार्य होता था और लंबे संघर्ष के बाद ही रविवार के अवकाश का प्रावधान हुआ। निस्संदेह, शिक्षक प्रकाश चंद्र उपाध्याय का यह अनुकरणीय योगदान शिक्षा जगत में हमेशा प्रेरणादायी उदाहरण के रूप में स्मरणीय रहेगा।
