सुंदरकांड पाठ के साथ सत्ता के घमंड पर प्रहार, भेदभाव के खिलाफ लोहाघाट ब्लॉक में आर-पार,लोहाघाट ब्लॉक में खुला टकराव: भेदभाव के आरोपों को लेकर जनप्रतिनिधियों का धरना शुरू। क्षेत्र पंचायत सदस्यों के धरने को ग्राम प्रधानों व पूर्व जनप्रतिनिधियों का खुला समर्थन

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फोटो – ब्लाक कार्यालय परिसर में आज से नाराज़ क्षेत्र पंचायत सदस्यों द्वारा शुरू किया गया बेमियादी धरना प्रदर्शन।

लोहाघाट। ब्लॉक कार्यालय परिसर अब सिर्फ प्रशासनिक भवन नहीं रहा, बल्कि वह स्थल बन चुका है जहां लोकतंत्र अपनी उपेक्षा के खिलाफ खुलकर सवाल कर रहा है। अपने साथ खुले भेदभाव का आरोप लगाते हुए क्षेत्र पंचायत सदस्यों द्वारा शुरू किया गया धरना अब सत्ता के अहंकार और प्रशासनिक चुप्पी के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रतीक बनता जा रहा है। आंदोलन को ग्राम प्रधानों और पूर्व जनप्रतिनिधियों का खुला समर्थन मिलने से यह साफ हो गया है कि मामला अब केवल कुछ सदस्यों की उपेक्षा का नहीं, बल्कि पूरी पंचायत व्यवस्था की विश्वसनीयता का है। लोहाघाट क्षेत्र पंचायत में कुल 34 सदस्य हैं। चुनाव में वर्तमान ब्लॉक प्रमुख को 18 और उनके प्रतिद्वंदी को 16 मत मिले थे। मात्र दो मतों के अंतर से बनी सत्ता तभी से दो खेमों में बंटी दिखाई दे रही है। आरोप है कि उसी चुनावी खींचतान की कीमत आज विरोधी खेमे के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को चुकानी पड़ रही है। विकास का पहिया थम गया है और निर्णय सत्ता की पसंद-नापसंद के तराजू पर तौले जा रहे हैं। धरने पर बैठे क्षेत्र पंचायत सदस्यों का सीधा आरोप है कि उनके द्वारा दिए गए किसी भी विकास प्रस्ताव को जानबूझकर फाइलों में दफन किया जा रहा है। न योजनाओं की जानकारी दी जा रही है, न चतुर्थ राज्य वित्त, 15वें वित्त आयोग या केंद्रीय वित्त से आई धनराशि के खर्च का कोई हिसाब सार्वजनिक किया जा रहा है। यह चुप्पी केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक पारदर्शिता पर सीधा प्रहार है। खंड विकास अधिकारी के.एस. रावत को ज्ञापन सौंपे जाने के बाद भी हालात जस के तस बने रहना इस बात की तस्दीक करता है कि जनप्रतिनिधियों को जानबूझकर अंधेरे में रखा जा रहा है।

धरने में शामिल क्षेत्र पंचायत सदस्य बबीता, रिचा मेहरा, नीमा धामी, उमा कुंवर, जयंती गोस्वामी, शोभन सिंह, अंकित बोहरा, अमित कुमार समेत अन्य सदस्यों का सवाल सीधा और स्पष्ट है—नई क्षेत्र पंचायत के गठन के बाद अब तक जनता के धन का उपयोग कहां और कैसे हुआ? उनके द्वारा दिए गए प्रस्तावों का क्या हुआ? और किन अधिकारों के तहत विकास को चुनिंदा हाथों तक सीमित कर दिया गया ?

इस आंदोलन को तब और धार मिली जब ग्राम प्रधानों और पूर्व जनप्रतिनिधियों ने खुलकर समर्थन दिया। महेश जोशी (ग्राम प्रधान डूंगरी), पुष्कर बोहरा (पूर्व जिला पंचायत सदस्य), पुष्कर कुंवर (ग्राम प्रधान कुनाड़ी), पवन भट्ट (ग्राम प्रधान ढोरजा), मोहन सिंह (ग्राम प्रधान कायल) और चंद्रकांत तिवारी (ग्राम प्रधान पासम) ने धरनास्थल पर पहुंचकर साफ कहा कि पंचायत व्यवस्था को व्यक्तिगत सत्ता का औजार नहीं बनने दिया जाएगा। सभी ने मांग की कि ब्लॉक स्तर पर संचालित प्रत्येक कार्य अनिवार्य रूप से टेंडर प्रक्रिया के तहत हो और वित्तीय लेन-देन का सार्वजनिक लेखा-जोखा रखा जाए। दिनभर चली नारेबाजी ने ब्लॉक कार्यालय को राजनीतिक अखाड़े में बदल दिया। प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ उठती आवाजें बता रही हैं कि यह आंदोलन फिलहाल थमने वाला नहीं है। क्षेत्र पंचायत सदस्यों ने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र पारदर्शिता नहीं लाई गई तो वे जिलाधिकारी की चौखट पर पहुंचकर जवाबदेही तय कराएंगे। धरने के दूसरे दिन सत्ता के शोर के बीच एक अलग ही दृश्य देखने को मिला। शासन-प्रशासन की सद्बुद्धि के लिए ब्लॉक कार्यालय प्रांगण में सुंदरकांड पाठ हुआ। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक गूढ़ संदेश था—जब लोकतंत्र की आवाज अनसुनी की जाती है, तब जनप्रतिनिधि सत्ता से नहीं, ईश्वर से न्याय की गुहार लगाते हैं। सुंदरकांड की चौपाइयों के बीच यह स्पष्ट हो गया कि यह संघर्ष पद या प्रतिष्ठा का नहीं, बल्कि सम्मान, अधिकार और पारदर्शिता की लड़ाई है, जो अब निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ चुका है।

 

 

 

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