फोटो – ऐसे सहकारी समितियों से साइलेज के बैग उठाकर अपने घरों की ओर ले जाती थी पशुपालक महिलाएं।
चंपावत। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा ग्रामीण और शहरी महिलाओं के सिर से घास का बोझ कम करने के उद्देश्य से करीब पांच वर्ष पूर्व शुरू की गई घसीयारी योजना आज अपने ही ठहराव का दंश झेल रही है। शुरुआत में तेजी से लोकप्रिय हुई यह योजना अब साइलेज (पशु आहार) की भारी किल्लत के चलते पशुपालकों की परेशानी का कारण बन गई है।
यह संकट ऐसे समय में गहराया है जब जाड़ों में जंगलों की हरियाली सूख चुकी है और मवेशियों के लिए जंगलों में भी चारा उपलब्ध नहीं है। 75 प्रतिशत अनुदान पर दी जाने वाली यह योजना सहकारी समितियों के माध्यम से संचालित होती है। टनकपुर, बनबसा, चंपावत, लोहाघाट के आसपास की समितियों के साथ-साथ बाराकोट, देवीधुरा क्षेत्र की समितियों में साइलेज की मांग सबसे अधिक रहती है।
जिला सहायक निबंधक प्रेम प्रकाश के अनुसार साइलेज की आपूर्ति न होने से पशुपालक रोजाना सहकारी समितियों के चक्कर काटने को मजबूर हैं, लेकिन उन्हें निराश होकर लौटना पड़ रहा है। जानकारी के मुताबिक पूरे राज्य में साइलेज की आपूर्ति उत्तराखंड साइलेज फेडरेशन, देहरादून के माध्यम से होती है, लेकिन सरकार से सब्सिडी की धनराशि न मिलने के कारण फेडरेशन के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। बताया जा रहा है कि सरकार पर फेडरेशन की लगभग 6 करोड़ रुपये की सब्सिडी बकाया है। साइलेज की कमी से किसानों और पशुपालकों को हो रही कठिनाइयों को देखते हुए जिलाधिकारी मनीष कुमार ने इस मामले में राज्य सरकार का ध्यान आकर्षित किया है। जिलाधिकारी का कहना है कि तीन चार दिन में साइलेज की आपूर्ति शुरू हो जाएगी। गौरतलब है कि चंपावत मॉडल जिले में अन्य जिलों की तुलना में दूध उत्पादन सर्वाधिक होता है, ऐसे में बीते कुछ महीनों से साइलेज की आपूर्ति ठप रहने से यहां के पशुपालक सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
