फोटो – एसीएफ सुनील कुमार की देखरेख में वन कर्मियों द्वारा ज़हरयुक्त अतिक्रमण से प्रभावित देवदार पेड़ों में गार्डनिंग एवं विशेष ट्रीटमेंट किया जाता हुआ।

फोटो – दुसरी और ऐसे देवदार वनी के अन्दर अतिक्रमण कर बनाए गए मकान।
चंपावत। जनपद के लोहाघाट नगर पालिका क्षेत्र में देवदार के दुर्लभ और ऐतिहासिक वृक्षों पर एक बार फिर संकट गहराता नजर आ रहा है। नगर क्षेत्र में अतिक्रमण की नीयत से किए गए ज़हर (गर्डलिंग/रसायन) के कारण सैकड़ों देवदार पेड़ों को सूखाने की साजिश सामने आई है। ताजा वन में कि गई गार्डनिंग की तस्वीरें जब मोबाइल पर वायरल हुईं, तब यह मामला जिलाधिकारी मनीष कुमार के संज्ञान में आया। इसके बाद वन विभाग हरकत में आया और तत्काल उपचारात्मक कार्रवाई शुरू की गई। प्रभागीय वन अधिकारी (एसीएफ) सुनील कुमार के नेतृत्व में वन विभाग की टीम ने करीब एक दर्जन से अधिक देवदार के हरे पेड़ों में गार्डनिंग एवं विशेष ट्रीटमेंट किया, ताकि उन्हें सूखने से बचाया जा सके। साथ ही वन संरक्षण अधिनियम के तहत संबंधित प्रकरण में मामला दर्ज किया गया है। हालांकि, लोहाघाट नगर क्षेत्र में देवदारों की सुरक्षा को लेकर वर्षों से एक बड़ी प्रशासनिक उलझन बनी हुई है। अधिकांश भूमि नजूल श्रेणी की है, जिसकी देखरेख राजस्व विभाग करता रहा है, जबकि पेड़ों की सुरक्षा का दायित्व नगर पालिका अथवा वन विभाग के बीच स्पष्ट रूप से तय नहीं हो पाया। जिलाधिकारी द्वारा जनवरी-फरवरी में एरिया वाइज विभागीय जिम्मेदारी तय करने की बात कही गई है, लेकिन जमीनी हकीकत में यह व्यवस्था व्यावहारिक रूप से कठिन मानी जा रही है। इस दोहरी व्यवस्था का ही परिणाम है कि नगर क्षेत्र से अब तक 12 हजार से अधिक देवदार के पेड़ गायब हो चुके हैं। वर्ष 1985 में, जब चंपावत पिथौरागढ़ जिले का हिस्सा था, तब तत्कालीन पर्यावरण प्रेमी जिलाधिकारी विजैन्दर पोल ने लोहाघाट नगर के प्रत्येक देवदार पेड़ की नंबरिंग कर विस्तृत रिकॉर्ड तैयार कराया था, जिसमें लगभग 15 हजार पेड़ दर्ज थे। वर्ष 2013 में तत्कालीन जिलाधिकारी श्री चौधरी द्वारा कराई गई गिनती में यह संख्या घटकर करीब 12 हजार रह गई। इसके बाद अवैध कटान और अतिक्रमण लगातार जारी रहा।
स्थिति यहां तक पहुंच गई कि दिनदहाड़े देवदारों पर कुल्हाड़ी चलने लगी। वन विभाग ने जुर्माना तो लगाया, लेकिन यह हिम्मत कैसे और किस संरक्षण में पैदा हुई, इस पर न तो गहन जांच हुई और न ही कोई स्थायी समाधान निकाला गया।
अब आवश्यकता इस बात की है कि पूरे देवदार आच्छादित क्षेत्र में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं और उनका नियंत्रण सीधे थाने से किया जाए। देवदार वन क्षेत्र की पूर्ण सुरक्षा वन विभाग को सौंपी जाए, जबकि नगर पालिका और वन विभाग की संयुक्त गश्त नियमित की जाए। साथ ही, वन क्षेत्र के आसपास रहने वाले लोगों को लिखित रूप से पेड़ों की सुरक्षा की जिम्मेदारी देकर उन्हें सहभागी बनाया जाए, ताकि वे इन्हें अपनी धरोहर समझकर बचा सकें। जब तक देवदारों की सुरक्षा का स्पष्ट उत्तरदायित्व तय नहीं होगा और अतिक्रमण को चिन्हित कर सख्ती से हटाया नहीं जाएगा, तब तक बचे हुए इन बहुमूल्य वृक्षों को सुरक्षित रखना संभव नहीं होगा। हैरानी की बात यह है कि दिल्ली, कोलकाता, मुंबई जैसे महानगरों से मायावती और रीठा साहिब आने वाले पर्यटक और तीर्थयात्री इन देवदारों के दर्द को महसूस करते हैं, लेकिन जो लोग इन्हीं पेड़ों की छांव में जीवन जी रहे हैं, वे अभी भी इसकी गंभीरता नहीं समझ पा रहे। हालांकि जिलाधिकारी मनीष कुमार ने प्रशासनिक तौर पर पक्का मन बनाया हुआ है की देवदार के पेड़ों की हर हाल में रक्षा व सुरक्षा कि जाएगी। लेकिन यह कब और कैसे की जाएगी ? इसकी लोग प्रतिक्षा कर रहे हैं।
