फोटो – पार्वती आमा
लोहाघाट। पार्वती आमा का जीवन अपने नाम के अर्थ को साकार करता रहा। पार्वती अन्नपूर्णा का स्वरूप और आमा ममता, करुणा और अपनत्व की जीवंत प्रतिमूर्ति। बुजुर्गों के अनुसार उनके आंगन से कभी कोई अतिथि, राहगीर या जरूरतमंद खाली हाथ नहीं लौटा। जिसे जैसी आवश्यकता होती, उसे वैसा ही सहारा मिलता भोजन, वस्त्र या स्नेह का आश्वासन।
आमा का संपूर्ण जीवन उस फलदार वृक्ष के समान था, जो फल से लदने पर और अधिक झुक जाता है। सम्पन्नता के साथ विनम्रता और सामर्थ्य के साथ करुणा यही संतुलन आमा की सच्ची पहचान था।
अंतिम भेंट में वे भले ही पहचान न पाईं, पर उनका मन रिश्तों को पहचानता रहा। उन्हें लगा कि मैं उनके मायके से आया हूँ और वे स्मृतियों में डूब गईं पुराना मकान, मंदिर, आंगन, जलस्रोत एक-एक दृश्य, एक-एक कथा। स्मृति भले धुंधली हो गई थी, पर मातृत्व की ममता पूर्णतः जागृत थी। बड़े स्नेह से बस इतना कहा “भोजन करके जाना।” उस क्षण उनका हृदय पूर्ण रूप से माँ का हृदय था निस्वार्थ, स्नेहिल और अपनत्व से भरा हुआ।
एक पुण्यात्मा की भांति आमा ने ईश्वर-प्राप्ति के लिए उत्तरायण की पवित्र तिथि को चुना। मान्यता है कि उत्तरायण में देह त्यागने वाला सूर्य-चक्र का भेदन कर वैकुण्ठ को प्राप्त होता है। किंतु सत्य यह है कि आमा जहां रहीं, वही स्थान वैकुण्ठ बन गया उनके कर्मों, उनके स्नेह और उनकी करुणा से। आज आमा हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी स्मृतियां मन के आंगन में बार-बार चली आती हैं—मौन होकर, स्नेह बनकर, आशीर्वाद की तरह। ईश्वर से प्रार्थना है कि पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें।
