आस्था, सौंदर्य और चमत्कारों का दिव्य संगम है श्री बालेश्वर धाम, गोलाना सेरी का बालेश्वर धाम जहां कण कण में भगवान शंकर के विराजमान होने की होती है अनुभूति

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फोटो – श्री बालेश्वर धाम का पाषाण मन्दिर जहां कण कण में महादेव विराजमान हैं।

रामेश्वरम से भी प्राचीन माने जाने वाले इस रौद्र शिव धाम तक आज भी कठिन राहों के बावजूद श्रद्धालु को यहां खींच लाती है उनकी आस्था।

 

(गणेश दत्त पाण्डेय)

 

लोहाघाट। जिले के पाटी विकासखंड अंतर्गत गोलाना सेरी में स्थित श्री बालेश्वर धाम केवल एक प्राचीन देवस्थल ही नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं की अटूट आस्था, विश्वास और शिव आराधना का प्रमुख केंद्र है। घाटी क्षेत्र में स्थित यह धाम भगवान शिव के रौद्र रूप को समर्पित है, जिसे रुद्र भी कहा जाता है। यह रूप अन्याय और आतंक के विरुद्ध शिव की उग्र, शक्तिशाली और विनाशकारी चेतना का प्रतीक माना जाता है। यहां भगवान शिव पंच प्रेतों—भूत, पिशाच, कूष्मांड, ब्रह्मराक्षस और बेताल के आसन पर विराजमान माने जाते हैं।

वर्ष 1995 से पूजा कर रहे पुजारी आनंद बल्लभ भट्ट बताते हैं कि उनके पूर्वजों के अनुसार इस मंदिर का संबंध त्रेतायुग से है। मान्यता है कि त्रेतायुग में ही रामेश्वरम की स्थापना हुई थी, जबकि यह रौद्र रूपी शिव धाम उससे लगभग तीन वर्ष पूर्व अस्तित्व में आ चुका था। प्राचीन काल में मुख्य मंदिर के अतिरिक्त परिसर में 22 अन्य मंदिर थे, जिनमें भगवान सूर्य का मंदिर भी शामिल था। आठवीं शताब्दी में हुई अतिवृष्टि और विनाशकारी जल प्रलय में अधिकांश मंदिर क्षतिग्रस्त हो गए, हालांकि उनके अवशेष आज भी परिसर में मौजूद हैं।

इतिहास के अनुसार मुगल आक्रांताओं ने भी इस मंदिर को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया था। मुख्य शिवलिंग पर किए गए प्रहार के निशान आज भी देखे जा सकते हैं। आक्रांताओं द्वारा मंदिर का स्वर्ण छत्र ले जाने के बावजूद उनकी मंशा सफल नहीं हो सकी और यह धाम आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का अक्षुण्ण केंद्र बना हुआ है। वर्ष 1140 से पूर्व यहां स्थानीय पुजारियों के 22 परिवार हुआ करते थे। बाद में उनके वंश में वृद्धि न होने पर नेपाल के राजा कांचन देव नृपति ने अपने शासनकाल में काशी से बंगज वंश के ब्राह्मण भट्ट परिवारों को यहां पुजारी के रूप में आमंत्रित किया। तभी से लेकर आज तक उन्हीं के वंशज इस मंदिर में पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं और संयोगवश आज भी उनके 22 ही परिवार हैं। सन् 1245 में राजा विक्रम चंद ने इन पुजारियों को भूमि और मंदिर दान में दिया था। वर्ष 1962 तक दान में दी गई भूमि की लगान राशि पुजारी परिवारों को प्राप्त होती रही।

इस धाम में प्रतिवर्ष कार्तिक, सावन, वैशाख और माघ मास में शिवार्चन, शिवपुराण और विशेष अनुष्ठान आयोजित होते हैं, जबकि शेष आठ महीनों में भैरव की पूजा होती है। भगवान शिव को भोग में उड़द और एक किलो चावल का भात अर्पित किया जाता है। चारों पूर्णिमाओं और संक्रांतियों पर खीर, माघ माह में घी और गुड़ तथा नवरात्र में विशेष नैवेद्य का भोग लगाया जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार भविष्य में यहां शिव महोत्सव आयोजित करने की योजना भी है। मंदिर परिसर के आसपास आठ श्मशान स्थल हैं, जहां क्षेत्र के लगभग 40 हजार लोग अंत्येष्टि के लिए आते हैं। वर्ष की संक्रांतियों, विशेष तिथियों और नवरात्र में बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां स्नान कर इसे तीर्थ स्थल के रूप में मानते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रतिवर्ष लगभग 10 हजार श्रद्धालु इस धाम में पहुंचते हैं, जबकि यह धाम अकेले पाटी विकासखंड के करीब 50 हजार लोगों की आस्था, पूजा और आराध्य देव की स्थली है। मंदिर घाटी क्षेत्र में स्थित होने के कारण यात्रियों की सुरक्षा, ठहरने और बढ़ती श्रद्धालु संख्या को देखते हुए इसके विस्तार की आवश्यकता महसूस की जा रही है। पुजारी आनंद बल्लभ भट्ट बताते हैं कि श्रद्धालुओं से प्राप्त दानराशि प्रतिदिन की पूजा, भोग, सफाई, बागवानी, पुजारी परिवारों के रहन-सहन और नित्य पूजन सामग्री में ही व्यय हो जाती है, जिससे विकास कार्य कर पाना संभव नहीं हो पाता।

सनातन परंपराओं के जानकार वेदाचार्य प्रकाश पाण्डेय कहते हैं कि उन्होंने अनेक शिव मंदिरों में पूजा-अर्चना की है, लेकिन जैसी अलौकिक अनुभूति श्री बालेश्वर धाम में हुई, वैसी कहीं और नहीं। उन्होंने अनुष्ठान के दौरान कई बार शिवलिंग पर नाग को लिपटे हुए प्रत्यक्ष देखने का अनुभव साझा किया। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां की गई मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले लोग इस धाम से जुड़े चमत्कारों की चर्चा करते हैं, जिनकी व्याख्या संभव नहीं है। इस शिव धाम का उल्लेख बद्रीदत्त पांडे की पुस्तक ‘कुमाऊं का इतिहास’, मानसखंड और पवित्र यजुर्वेद में भी मिलता है। पर्यटन और धार्मिक आस्था को समेटे यह श्री बालेश्वर धाम बिना किसी बड़े प्रचार-प्रसार के भी हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। स्थानीय निवासी नंदू पाण्डेय और वयोवृद्ध गिरधर जोशी का कहना है कि यदि सरकार इस प्राचीन धार्मिक स्थल को मंदिर माला मिशन में शामिल कर विकसित करती है तो इससे धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर भी प्राप्त होंगे। कुमाऊं की इस अमूल्य धार्मिक और पौराणिक धरोहर को संरक्षित करना और विकसित करना समय की आवश्यकता है।

 

 

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