लोहाघाट (चम्पावत)। उत्तराखंड की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान में स्वामी विवेकानंद की यात्राओं का विशेष स्थान रहा है। कुमाऊँ मंडल के अनेक स्थल उनकी अंतिम और ऐतिहासिक यात्राओं के साक्षी रहे हैं, किंतु आज भी ये स्थान संरक्षण और पर्यटन विकास की दृष्टि से उपेक्षित हैं। यह निष्कर्ष स्वामी विवेकानंद राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, लोहाघाट के राजनीति विज्ञान विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. प्रकाश लखेड़ा द्वारा किए गए शोध-अध्ययन में सामने आया है। डॉ. प्रकाश लखेड़ा के शोध-पत्र के अनुसार स्वामी विवेकानंद ने उत्तराखंड की पाँच यात्राएँ कीं, जिनमें चार यात्राएँ कुमाऊँ मंडल में 1892, 1897, 1898 और 1901 में हुईं। उनकी अंतिम यात्रा मायावती अद्वैत आश्रम (जिला चम्पावत) से जुड़ी रही, जिसका उद्देश्य हिमालय क्षेत्र में अद्वैत वेदांत पर आधारित मठ की स्थापना करना था।
शोध में बताया गया है कि 28 अक्टूबर 1900 को मायावती आश्रम के संस्थापक कैप्टन सेवियर के निधन के पश्चात स्वामी विवेकानंद गहरे शोक में थे। इसी क्रम में उन्होंने अत्यंत प्रतिकूल मौसम और दुर्गम मार्गों के बीच यात्रा की। 29 दिसंबर 1900 को वे काठगोदाम पहुँचे, 30 दिसंबर को धारि डांकबंगले में रात्रि विश्राम किया, 31 दिसंबर 1900 को पहाड़पानी में रुके तथा 1 जनवरी 1901 को मोरनौला डांकबंगले में नया वर्ष मनाया। 2 जनवरी को रात्रि विश्राम के बाद 3 जनवरी 1901 को वे मायावती आश्रम पहुँचे।
डॉ. लखेड़ा के अनुसार धारि, पहाड़पानी, मोरसौला और धुनाघाट स्वामी विवेकानंद की इस ऐतिहासिक यात्रा के प्रमुख पड़ाव रहे हैं, किंतु इन स्थलों पर आज तक न तो विवेकानंद केंद्र स्थापित हो पाए हैं और न ही समुचित पर्यटन ढांचा विकसित हो सका है। स्थानीय स्तर पर केवल पहाड़पानी और मोरनौला में सूचना पट लगाए गए हैं, जबकि अन्य स्थलों पर पहचान तक सीमित है। शोध-पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि काठगोदाम से चम्पावत तक लगभग 170 किलोमीटर का यह यात्रा मार्ग प्राकृतिक सौंदर्य, शांत वातावरण और आध्यात्मिक अनुभूति से परिपूर्ण है। यदि इन स्थलों को ध्यान केंद्र, पुस्तकालय और विवेकानंद अध्ययन केंद्र के रूप में विकसित किया जाए तो यह क्षेत्र आध्यात्मिक पर्यटन के साथ-साथ स्थानीय रोजगार और सामाजिक विकास का माध्यम बन सकता है। डॉ. लखेड़ा ने अपने शोध के निष्कर्ष में केंद्र और राज्य सरकार से आग्रह किया है कि स्वामी विवेकानंद की उत्तराखंड यात्रा से जुड़े स्थलों का सर्वे कर उन्हें संरक्षित किया जाए तथा कुमाऊँ मंडल के इन ऐतिहासिक स्थलों को विश्व पर्यटन मानचित्र पर स्थान दिलाने के लिए ठोस नीति बनाई जाए।
