माॅडल जिले चम्पावत में रेशम उत्पादन से बदलेगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर, चंपावत में सफल ट्रायल के बाद किसानों की बढ़ी उम्मीदें, मध्य गंगोल के त्यारसौ गांव में कोकून उत्पादन सफल, अब बी-1 प्रजाति के 5 हजार पौधों का होगा रोपण; युवाओं के लिए बन रहा रोजगार का नया विकल्प

 

फोटो मध्य गंगोल क्षेत्र में रेशम उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए पौधरोपण करते पूर्व उपाध्यक्ष राजशेखर जोशी, डॉ. आर.के. शर्मा, पलायन आयोग सदस्य सुरेश सुयाल एवं बाटुली एफपीओ के समन्वयक नरेंद्र महरा।

 

लोहाघाट। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की मॉडल जिला परिकल्पना को साकार करने की दिशा में चम्पावत में रेशम उत्पादन नई संभावनाओं के साथ उभर रहा है। मध्य गंगोल क्षेत्र के त्यारसौ गांव में प्रगतिशील किसान नीरज महरा और भीम कुमार द्वारा किए गए रेशम उत्पादन के ट्रायल की सफलता ने क्षेत्र के किसानों और युवाओं में नई उम्मीद जगा दी है।

ट्रायल के दौरान किसानों ने 11 किलो 800 ग्राम कोकून का उत्पादन किया। वर्तमान में बाजार में कोकून की कीमत करीब 600 रुपये प्रति किलो है, जिससे यह खेती किसानों के लिए आय का बेहतर स्रोत बनने की संभावना रखती है।

ट्रायल की सफलता के बाद अब क्षेत्र में रेशम की उन्नत बी-1 प्रजाति को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके तहत 5 हजार पौधों का रोपण किया जाएगा, जिनमें से 2,500 पौधे मध्य गंगोल क्षेत्र में लगाए जा रहे हैं।

रेशम विभाग के विनोद महरा ने बताया कि ट्रायल पूरी तरह सफल रहा है और अब रेशम उत्पादन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बनेगा।

कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डॉ. आर.के. शर्मा ने कहा कि युवा किसानों नीरज महरा और भीम कुमार का यह प्रयास क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा है। इससे स्वरोजगार के नए अवसर विकसित होंगे और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नया आधार मिलेगा। बाटुली एफपीओ के संचालक नरेंद्र महरा ने बताया कि क्षेत्र में रेशम के पौधों का रोपण तेजी से किया जा रहा है। खास बात यह है कि गांव के कई युवा इस पहल से जुड़ रहे हैं और इसे अपने भविष्य के रोजगार के रूप में देख रहे हैं। पलायन आयोग के सदस्य सुरेश सुयाल ने कहा कि इस तरह की पहल न केवल स्थानीय लोगों को रोजगार उपलब्ध कराएगी, बल्कि युवाओं को अपनी माटी से जोड़ने और पलायन रोकने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।