बिरुड़ा पंचमी और घी त्यार ने सजाया पहाड़ का लोकजीवन, परंपराओं में दिखी संस्कृति की गहरी जड़ें

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चम्पावत : कुमाऊं की लोकसंस्कृति में रचे-बसे बिरुड़ा पंचमी और घी संक्रांति यानी घी त्यार जैसे पर्व आज भी पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए हुए हैं। इन पर्वों के अवसर पर घर-आंगन में पारंपरिक रीति-रिवाज निभाए गए और नई पीढ़ी को सदियों पुरानी लोकपरंपराओं से जोड़ने का प्रयास हुआ।

 

बिरुड़ा पंचमी रक्षाबंधन से पहले मनाई जाने वाली महत्वपूर्ण लोकपरंपरा है। इस दिन घरों में महिलाएं विभिन्न प्रकार की दालों और अनाजों को साफ कर विधि-विधान से भिगोती हैं। बिरुड़ों को पूजा स्थल पर रखकर परिवार की सुख-शांति, आरोग्य और समृद्धि की कामना की जाती है। इसके साथ ही रक्षाबंधन की तैयारियों का सिलसिला भी शुरू हो जाता है।

 

कुमाऊं के गांवों में बिरुड़ा पंचमी का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। यह पर्व परिवार, पड़ोस और सामाजिक रिश्तों को जोड़ने वाली परंपरा के रूप में भी अपनी पहचान बनाए हुए है। बदलती जीवनशैली और पलायन के दौर में भी अनेक परिवार पूरी श्रद्धा के साथ इस परंपरा को निभा रहे हैं।

 

वहीं घी संक्रांति या घी त्यार पहाड़ के कृषि और पशुपालन आधारित जीवन से गहराई से जुड़ा पर्व है। इस अवसर पर घरों में घी से तैयार पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। लोकमान्यता में इस दिन घी का सेवन स्वास्थ्य और समृद्धि से जुड़ा माना जाता है। रोट, पूरी, अरसा समेत स्थानीय पकवानों से पहाड़ी रसोई महक उठती है।

 

घी त्यार को केवल खान-पान का पर्व मानना इसके व्यापक सांस्कृतिक अर्थ को सीमित करना होगा। यह ऋतु परिवर्तन, कृषि जीवन, पशुधन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की भावना से जुड़ी लोकपरंपरा है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इस पर्व का उत्साह विशेष रूप से दिखाई देता है।

 

बुजुर्गों का कहना है कि इन पर्वों की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इनके माध्यम से बच्चे केवल परंपराएं देखते नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपी जीवन-पद्धति और सामाजिक मूल्यों को भी समझते हैं। ऐसे पर्व परिवार और समाज को जोड़ने के साथ नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से परिचित कराने का माध्यम बनते हैं।

 

हालांकि आधुनिक जीवनशैली और पलायन के कारण कई लोकपरंपराएं धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही हैं, लेकिन बिरुड़ा पंचमी और घी त्यार आज भी पहाड़ के गांवों में अपनी पहचान कायम रखे हुए हैं।

 

इन पर्वों का संदेश साफ है—लोकसंस्कृति केवल इतिहास की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी भी है। परंपराएं तभी जीवित रहेंगी, जब नई पीढ़ी उन्हें निभाने के साथ उनके महत्व को भी समझेगी।

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