फोटो – कोटकेंद्री गांव से करीब चार किलोमीटर दूर तक डोली में घायल महिला को सड़क तक ले जाते ग्रामीण।
चम्पावत। मुख्यमंत्री के मॉडल जिले में विकास के दावे भले ही कागज़ों में चमक रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी उतनी ही पीड़ादायक है। सोमवार की शाम कोटकेंद्री गांव की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर पहाड़ के ग्रामीण कब तक बीमार और घायल लोगों को डोली में ढोने को मजबूर रहेंगे। 35 वर्षीय पुष्पा देवी, पत्नी रतन सिंह, जंगल में बकरियों के लिए चारा काटने गई थीं। इसी दौरान पेड़ से गिरने के कारण वह गंभीर रूप से घायल हो गईं। दुर्भाग्य यह रहा कि न तो आसपास कोई अस्पताल था और न ही गांव तक पहुँचने के लिए सड़क। सूचना मिलने पर परिजनों और ग्रामीणों ने मानवीय संवेदना दिखाते हुए पुष्पा देवी को करीब चार किलोमीटर तक डोली में उठाकर सड़क तक पहुँचाया। इसके बाद लक्ष्मण सिंह, मदन सिंह, मोहन सिंह, दीपक सिंह समेत अन्य ग्रामीणों के सहयोग से उन्हें टनकपुर के उप जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया गया, जहां महिला का उपचार जारी है।
यह कोई पहली घटना नहीं है। बल्कि यह उस व्यवस्था की तस्वीर है, जहां योजनाएं फाइलों में चलती हैं और मरीज कंधों पर। लोक निर्माण विभाग द्वारा पोथ – कोटकेंद्री–छैलागाड़ होते हुए 18 किलोमीटर लंबी सड़क प्रस्तावित किए जाने की बात वर्षों से कही जा रही है, लेकिन धरातल पर आज भी वही पगडंडियां और मजबूरियां हैं।
कालीगूंठ के ग्राम प्रधान पंकज तिवारी का कहना है कि ग्रामीण सड़क की मांग करते-करते थक चुके हैं, लेकिन अब तक उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिले हैं। हर हादसे के बाद सवाल उठते हैं, बयान दिए जाते हैं, मगर कुछ समय बाद सब फिर शांत हो जाता है जब तक अगला हादसा न हो। यह घटना केवल एक महिला के घायल होने की खबर नहीं है, बल्कि यह नीतियों और जमीनी सच्चाई के बीच की खाई का जीवंत प्रमाण है। यदि यही हाल मुख्यमंत्री के मॉडल जिले का है, तो दूर-दराज के अन्य गांवों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। अब समय आ गया है कि डोली की तस्वीरें योजनाओं की फाइलों से बाहर निकलें और सड़कों के रूप में धरातल पर उतरें।
