

फोटो : श्री बाराही मंदिर ट्रस्ट के संस्थापक अध्यक्ष हीरा बल्लभ जोशी एवं ट्रस्टी लक्ष्मण सिंह लंगड़िया, बाराही धाम की प्राचीन परंपराओं और बग्वाल के धार्मिक स्वरूप को लेकर जानकारी देते हुए।
लोहाघाट। परमाणु युग में भी देवीधुरा स्थित मां बाराही धाम का प्रसिद्ध पाषाण युद्ध यानी “आषाढ़ी कौतिक” अपनी सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं को जीवंत रखे हुए है। इस बार मेले की सभी व्यवस्थाएं श्री बाराही मंदिर ट्रस्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार संचालित की जाएंगी। मेले के पुरातन स्वरूप और धार्मिक परंपराओं से किसी प्रकार की छेड़छाड़ किए बिना अन्य व्यवस्थाओं को विधि-विधान के अनुसार पूरा करने पर जोर दिया जा रहा है।
श्री बाराही मंदिर ट्रस्ट के संस्थापक अध्यक्ष, रेलवे कॉरिडोर में महानिदेशक रह चुके तथा वेद-पुराणों एवं धार्मिक क्रियाकलापों के जानकार हीरा बल्लभ जोशी का कहना है कि उत्तर भारत में मां बाराही का यह ऐसा विशिष्ट धाम है, जिसकी अलौकिक मान्यताएं और अनूठी धार्मिक परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं। उन्होंने बताया कि शताब्दियों पूर्व यहां के पूर्वजों ने कुमाऊं के विभिन्न क्षेत्रों और सभी वर्गों के लोगों को मां बाराही की पूजा में शामिल किया। इसके पीछे समाज में सामाजिक समरसता, भाईचारा और एकता बनाए रखने की भावना रही होगी।
हीरा बल्लभ जोशी के अनुसार बाराही धाम की बग्वाल केवल पत्थरों के युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। मान्यता है कि बग्वाल के दौरान यक्ष, गंधर्व, योगिनी और डाकिनी जैसी अदृश्य शक्तियां भी इसमें शामिल होती हैं। मां के सिंहासन-डोले को उठाने वाले लोगों के साथ गाजे-बाजे वाले, डागर, जागरिया, द्यौंक, पुजारी, ढोली, छुड़ैल और हुड़किया आदि पर मां बाराही की शक्ति का संचार होता है और वे भक्ति में पूरी तरह लीन हो जाते हैं। श्रद्धालु उन पर अक्षत और पुष्पों की वर्षा कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
उन्होंने बताया कि मां बाराही की पूजा में कुमाऊं के 775 गांवों के लोगों की पारंपरिक भागीदारी है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह परंपरा आगे बढ़ती आ रही है। मेले के दौरान इन सभी लोगों को मां बाराही के ‘दूत’ के रूप में माना जाता है। इस अवधि में परंपरा से जुड़े लोग सात्विक जीवन व्यतीत करते हैं और तामसिक पदार्थों का सेवन वर्जित माना जाता है।
स्थानीय लोगों के लिए बलि, बग्वाल, डोली और जवानी में भागीदारी महज किसी आयोजन का हिस्सा नहीं, बल्कि देवी के प्रति आस्था और अनुष्ठान का महत्वपूर्ण अंग है। यही वजह है कि आधुनिक दौर में भी बाराही धाम की प्राचीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान कायम है।
वहीं श्री बाराही मंदिर के ट्रस्टी लक्ष्मण सिंह लंगड़िया का कहना है कि पाषाण मेले की ख्याति अब सात समुंदर पार तक पहुंच चुकी है। बग्वाल यहां के मेले का सबसे बड़ा आकर्षण बन चुकी है और इसे देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं पर्यटक देवीधुरा पहुंचते हैं। उन्होंने कहा कि लगातार बढ़ती भीड़ के साथ अब सभी की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है कि बग्वाल का स्वरूप पूरी तरह अनुशासित रहे और सदियों पुरानी परंपराओं की गरिमा भी बनी रहे। उन्होंने कहा कि श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए व्यवस्थाओं को बेहतर बनाना जरूरी है, लेकिन ऐसा करते समय बाराही धाम की मूल परंपराओं और धार्मिक स्वरूप को संरक्षित रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।



