झूमाधुरी धाम में आस्था का अद्भुत संसार, जहां दैवीय शक्तियों से साक्षात्कार की मान्यता, 2400 मीटर की ऊंचाई पर विराजमान मां नंदा का दरबार, नंदा देवी, त्रिशूल और पंचाचूली की चोटियां देती हैं दिव्य दर्शन

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फोटो : झूमाधुरी नंदा देवी मंदिर में नंदाष्टमी के अवसर पर श्रद्धालुओं द्वारा रस्सों के सहारे खींची जा रही मां नंदा की भव्य रथ यात्रा।

लोहाघाट। देवभूमि उत्तराखंड की पर्वत श्रृंखलाएं, कल-कल करते झरने, घने जंगल और निर्मल वातावरण आध्यात्मिक अनुभूति का एहसास कराते हैं। इन्हीं प्राकृतिक और धार्मिक आस्थाओं के बीच लोहाघाट नगर से करीब चार किलोमीटर दूर उत्तर-पश्चिम दिशा में समुद्र तल से लगभग 2400 मीटर की ऊंचाई पर स्थित झूमाधुरी नंदा देवी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि यहां मां नंदा की आराधना करने से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और निसंतान दंपतियों की गोद भरती है।

स्थानीय लोगों के अनुसार पाटन-पाटनी और रायकोट क्षेत्र के श्रद्धालुओं को वर्षों पहले अदृश्य दैवीय शक्ति से इस स्थान पर मंदिर स्थापित करने की प्रेरणा मिली थी। मंदिर का मूल स्थान वर्तमान मंदिर से पूर्व दिशा में बताया जाता है, जहां पहुंचना आज भी कठिन है। करीब एक शताब्दी से वर्तमान मंदिर परिसर में नंदाष्टमी मेले का आयोजन होता आ रहा है। पिछले डेढ़ दशक से यहां चार दिवसीय झूमाधुरी नंदाष्टमी महोत्सव का आयोजन भी भव्य रूप से किया जा रहा है। नंदाष्टमी के अवसर पर पाटन-पाटनी और रायकोट कुंवर गांव से मां नंदा और महाकाली की भव्य रथ यात्राएं निकाली गईं। शुक्रवार रात दोनों गांवों में देवी जागरण हुआ। शनिवार दोपहर बाद पहले पाटन-पाटनी और फिर रायकोट कुंवर गांव से रथ यात्रा रवाना हुई। हाथों में चंवर लिए श्रद्धालु मां के जयकारे लगाते हुए आगे बढ़े। मंदिर की तलहटी में स्थित प्राचीन छोटे मंदिर में दोनों रथों को रोककर देवी-देवताओं को भोग लगाया गया।

इसके बाद करीब दो किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई शुरू हुई। श्रद्धालुओं ने रस्सों के सहारे रथों को खींचते हुए जयकारों के बीच मुख्य मंदिर तक पहुंचाया। जैसे ही दोनों रथ मंदिर परिसर में पहुंचे, पूरा क्षेत्र श्रद्धालुओं से भर गया। दोनों रथों द्वारा मंदिर की परिक्रमा का दृश्य श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण रहा और इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचे। झूमाधुरी की खासियत इसकी प्राकृतिक सुंदरता भी है। करीब 7000 फीट की ऊंचाई पर स्थित मंदिर से मौसम साफ होने पर हिमालय की नंदा देवी, त्रिशूल और पंचाचूली समेत कई ऊंची चोटियों का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। यहां से पिथौरागढ़, चंपावत, अल्मोड़ा और नैनीताल जिलों की ऊंची पहाड़ियों का नजारा भी देखा जा सकता है। स्थानीय लोगों के अनुसार कभी इस क्षेत्र में गुप्त गंगा का झरना बहता था, जो कालांतर में लुप्त हो गया। आज भी इसकी निशानी के रूप में यहां नौला मौजूद है।

मंदिर और मेले से जुड़े कई लोकविश्वास आज भी क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। तलहटी स्थित प्राचीन मंदिर के बारे में भी अदृश्य शक्तियों से जुड़े लोकविश्वास प्रचलित रहे हैं। समय के साथ ये मान्यताएं अब इतिहास और लोककथाओं का हिस्सा बन गई हैं। नंदाष्टमी मेले में धार्मिक आस्था के साथ व्यापारिक गतिविधियां भी देखने को मिलीं। मैदानी क्षेत्रों से पहुंचे व्यापारियों ने दुकानें सजाईं। सुहावने मौसम और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ से मेले में रौनक बनी रही। मां झूमाधुरी समिति के अध्यक्ष मोहन चंद्र पाटनी के अनुसार करीब 20 हजार श्रद्धालु डोला-रथ यात्रा के साक्षी बने। सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिए पुलिस का व्यापक बंदोबस्त किया गया था। धार्मिक आस्था, लोक परंपरा और हिमालयी प्राकृतिक सौंदर्य के संगम के बीच चार दिवसीय झूमाधुरी नंदाष्टमी महोत्सव का समापन हुआ।

 

 

 

 

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